धाधू पश्चिमी कोयला खनन परियोजना
अधिकारी मंच तक नहीं पहुंच पाए, ग्रामीणों ने लगाए ‘जनसुनवाई रद्द करो’ और ‘जल-जंगल-जमीन हमारा है’ के नारे
बालूमाथ में पर्यावरणीय जनसुनवाई पर बवाल, हंगामे के बीच नहीं हो सकी कार्यवाही
अधिकारी मंच तक नहीं पहुंच पाए, ग्रामीणों ने लगाए ‘जनसुनवाई रद्द करो’ और ‘जल-जंगल-जमीन हमारा है’ के नारे
बालूमाथ/लातेहार। बालूमाथ प्रखंड सह अंचल
कार्यालय परिसर में एनएलसी इंडिया लिमिटेड की प्रस्तावित धाधू पश्चिमी कोयला खनन परियोजना को लेकर गुरुवार को आयोजित पर्यावरणीय जनसुनवाई विरोध और हंगामे की भेंट चढ़ गई। भारी संख्या में पहुंचे ग्रामीणों के विरोध के कारण प्रशासनिक अधिकारियों को मंच तक पहुंचने नहीं दिया गया और अंततः जनसुनवाई स्थगित करनी पड़ी।
जिला प्रशासन की ओर से जनसुनवाई के लिए प्रतिनियुक्त जिला भू-अर्जन पदाधिकारी प्रभात कुमार ने भी इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि निर्धारित प्रक्रिया के तहत जनसुनवाई हो ही नहीं सकी, क्योंकि अधिकारी मंच तक नहीं पहुंच पाए।
4.5 मिलियन टन सालाना उत्पादन की है प्रस्तावित योजना
बताया गया कि धाधू पश्चिमी कोयला खनन परियोजना के लिए एनएलसी इंडिया लिमिटेड को कोल ब्लॉक मिला है। परियोजना की प्रस्तावित उत्पादन क्षमता 4.5 मिलियन टन प्रतिवर्ष है और इसके लिए करीब 1765.46 एकड़ भूमि प्रस्तावित बताई गई है। परियोजना के अंतर्गत हेमपुर, भैंसादोन, सेमरसोत, धाधू, चितरपुर और नवाडीह सहित कई गांव प्रभावित होने की बात कही गई है।
टेंट में प्रवेश को लेकर भी हुआ विवाद
जनसुनवाई स्थल पर लगाए गए टेंट में मीडिया कर्मियों, स्वास्थ्यकर्मियों और अधिकारियों के प्रवेश को लेकर भी विवाद की स्थिति बनी। मौके पर पहुंचे कुछ पत्रकारों को अंदर जाने से रोके जाने की बात सामने आई। वहीं, ग्रामीणों के एक पक्ष ने आरोप लगाया कि परियोजना से सीधे प्रभावित नहीं होने वाले क्षेत्रों से भी लोगों को बड़ी संख्या में लाया गया, जिससे वास्तविक प्रभावित ग्रामीणों की बात दबने की आशंका बनी।
दूसरी ओर, कुछ ग्रामीणों का आरोप है कि बाहरी लोगों की मौजूदगी से जानबूझकर विवाद की स्थिति पैदा की गई। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
विरोध के बीच धक्का-मुक्की और तनाव
कार्यक्रम के दौरान नारेबाजी और विरोध के बीच कई बार धक्का-मुक्की की स्थिति भी बनी। आरोप है कि कुछ लोगों ने भीड़ को उकसाने का प्रयास किया। वहीं, अपनी बात रखने पहुंचे प्रभावित ग्रामीणों और जमीन देने के पक्ष में अपनी राय रखने वाले लोगों को भी अंदर जाने में परेशानी हुई।
मौके पर पुलिस बल की मौजूदगी के बावजूद जब स्थिति सामान्य नहीं हो सकी तो प्रशासन को जनसुनवाई स्थगित करनी पड़ी।
अब बड़ा सवाल—अगली जनसुनवाई कब और कैसे होगी?
बालूमाथ की इस घटना ने पर्यावरणीय जनसुनवाई की प्रक्रिया, प्रभावित ग्रामीणों की भागीदारी और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या अगली जनसुनवाई में सभी प्रभावित पक्षों को बिना दबाव अपनी बात रखने का मौका मिलेगा? अब प्रशासन के अगले कदम पर सबकी नजर है।



