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बिना बिड खोले टेंडर रद्द, जांच के घेरे में पूरी प्रक्रिया

रिनपास में 4 करोड़ की दवा खरीद पर बड़ा सवाल! बिना बिड खोले टेंडर रद्द, नई शर्तों पर उठे गंभीर आरोप

राँची। झारखंड के सबसे बड़े मनोरोग उपचार संस्थान रिनपास (RINPAS) में लगभग 4 करोड़ रुपये की वार्षिक दवा खरीद को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। आरोप है कि पहले जारी टेंडर को बिना किसी बिड को खोले ही रद्द कर दिया गया और बाद में जारी नए टेंडर में कई महत्वपूर्ण शर्तों को या तो हटा दिया गया या काफी आसान बना दिया गया। जानकारों का दावा है कि यह बदलाव किसी विशेष कंपनी को फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से किए गए हो सकते हैं। हालांकि, इस आरोप की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

बिना बिड खोले टेंडर रद्द, जांच के घेरे में पूरी प्रक्रिया

दस्तावेज़ों के अनुसार, रिनपास ने 19 मार्च 2026 को दवा आपूर्ति के लिए पहला टेंडर जारी किया था, जिसकी अंतिम तिथि 20 अप्रैल 2026 थी। सभी कंपनियों से निविदाएं प्राप्त होने के बाद भी 25 अप्रैल को बिना बिड खोले ही टेंडर रद्द कर दिया गया। इसके करीब तीन महीने बाद 22 जुलाई 2026 को नया टेंडर जारी किया गया।

नई निविदा में बदली गईं कई अहम शर्तें

नए टेंडर में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। टेंडर फीस 25 हजार रुपये से घटाकर 5 हजार रुपये कर दी गई, जबकि अर्नेस्ट मनी डिपॉजिट (EMD) को 8 लाख रुपये से घटाकर 2.5 लाख रुपये कर दिया गया।

पुराने टेंडर में सप्लायर के लिए कम से कम 1 करोड़ रुपये के वार्षिक टर्नओवर की शर्त थी, जिसे नए टेंडर से हटा दिया गया। वहीं दवा निर्माता कंपनी के टर्नओवर की अनिवार्यता भी 25 करोड़ से घटाकर 20 करोड़ रुपये कर दी गई।

इसके अलावा, दवा आपूर्ति के अनुभव, अनुभव प्रमाण पत्र, ब्लैकलिस्ट न होने का शपथ पत्र, ऑथोरिटी लेटर, मैन्युफैक्चरर प्रोडक्शन डिक्लेरेशन, सप्लाई में देरी पर पेनल्टी और आवश्यकता पड़ने पर प्लांट निरीक्षण जैसी महत्वपूर्ण शर्तों को भी नए टेंडर से हटाने का दावा किया गया है।

गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा पर उठे सवाल

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गुणवत्ता और अनुभव से जुड़ी शर्तों में ढील दी जाती है, तो इससे दवा आपूर्ति की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। मानसिक रोगियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की गुणवत्ता और समय पर उपलब्धता बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।

जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब का इंतजार

रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले में रिनपास की निदेशक डॉ. जयति सिमलाई और टेंडर प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों से स्पष्टीकरण लेने का प्रयास किया गया, लेकिन विस्तृत जवाब सामने नहीं आया। वहीं, स्वास्थ्य विभाग की ओर से भी अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया जारी नहीं की गई है।

फिलहाल यह मामला गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल टेंडर प्रक्रिया का नहीं, बल्कि सरकारी खरीद प्रणाली की पारदर्शिता और मरीजों के हितों से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन सकता है। स्वास्थ्य विभाग और संबंधित अधिकारियों के आधिकारिक पक्ष तथा जांच के निष्कर्ष का इंतजार है।

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