शिक्षक गायब! बच्चे बेहाल! शिक्षा विभाग पर सवाल
चंदवा के जपुआटांड़ स्कूल में शिक्षक गायब, बच्चों की पढ़ाई बेहाल! शिक्षा विभाग की निगरानी व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल

चंदवा के जपुआटांड़ स्कूल में शिक्षक गायब, बच्चों की पढ़ाई बेहाल! शिक्षा विभाग की निगरानी व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल

जब शिक्षक ही स्कूल से नदारद तो बच्चों की पढ़ाई कौन संभालेगा? जपुआटांड़ विद्यालय की व्यवस्था ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर खड़े किए सवाल
चंदवा (लातेहार)। चंदवा प्रखंड के मल्हन पंचायत स्थित उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय जपुआटांड़ में शिक्षकों की कथित अनुपस्थिति को लेकर शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि विद्यालय में पढ़ने वाले छोटे-छोटे बच्चों को शिक्षक की गैरमौजूदगी में घंटों तक अकेले रहना पड़ रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि जिन बच्चों के भविष्य की जिम्मेदारी विद्यालय और शिक्षा विभाग पर है, उनकी पढ़ाई और सुरक्षा को लेकर निगरानी आखिर कितनी गंभीरता से की जा रही है?
ग्रामीणों का आरोप है कि शिक्षक के लंबे समय तक विद्यालय से अनुपस्थित रहने के कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। विद्यालय में नियमित शिक्षण व्यवस्था के साथ-साथ मध्यान भोजन को लेकर भी शिकायतें सामने आई हैं। ग्रामीणों के अनुसार बच्चों को अपेक्षित पौष्टिक भोजन नहीं मिल पा रहा है और कई बार भोजन केवल दाल-भात तक सीमित रहने का आरोप है।
सिर्फ शिक्षक ही नहीं, निगरानी व्यवस्था भी सवालों के घेरे में
मामला केवल एक शिक्षक की अनुपस्थिति तक सीमित नहीं है। यदि विद्यालय में शिक्षक लंबे समय तक अनुपस्थित रहते हैं और इसकी जानकारी समय रहते संबंधित अधिकारियों तक नहीं पहुंचती, तो यह संकुल संसाधन केंद्र और प्रखंड स्तर की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा करता है।
आखिर विद्यालयों की नियमित मॉनिटरिंग कौन करता है? शिक्षकों की उपस्थिति की जांच कितनी नियमित होती है? मध्यान भोजन की गुणवत्ता और व्यवस्था की निगरानी किस स्तर पर की जाती है? और यदि कहीं व्यवस्था में लापरवाही हो रही है तो उस पर कार्रवाई क्यों नहीं होती?
शिक्षक ने बताई अपनी मजबूरी
मामले में संबंधित शिक्षक की ओर से बताया गया कि उनकी तबीयत खराब थी और दवा लेने के लिए उन्हें घर जाना पड़ा। इसके बाद चंदवा जाकर फॉर्म भरने तथा बीआरसी से संबंधित कार्य के लिए जाना पड़ा। शिक्षक ने मध्यान भोजन की राशि समय पर नहीं मिलने के कारण व्यवस्था में परेशानी होने की बात भी कही है।
हालांकि, सवाल यह है कि यदि शिक्षक को स्वास्थ्य या विभागीय कार्य से विद्यालय से बाहर जाना पड़ा, तो क्या विद्यालय में बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसके लिए वैकल्पिक व्यवस्था की गई थी?
BEO ने जांच और कार्रवाई की बात कही
प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारी ने मामले को गंभीरता से लेते हुए स्पष्ट किया कि शैक्षणिक कार्य के समय शिक्षकों को कार्यालय आने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि कार्यालय अथवा अन्य विभागीय कार्य दोपहर 3 बजे के बाद किए जाएं।
पदाधिकारी ने शिक्षकों की लगातार अनुपस्थिति की जांच कराने और दोषी पाए जाने पर कार्रवाई की बात कही है। साथ ही संकुल संसाधन केंद्र को विद्यालयों की नियमित निगरानी, शिक्षकों की उपस्थिति सुनिश्चित कराने और मध्यान भोजन की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देने का निर्देश दिया गया है।
अब सबसे बड़ा सवाल—जवाबदेही किसकी?
सरकार शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने और ग्रामीण बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के दावे करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर यदि विद्यालय में शिक्षक की अनुपस्थिति, पढ़ाई में बाधा और मध्यान भोजन को लेकर शिकायतें सामने आती हैं तो इसकी जिम्मेदारी केवल एक शिक्षक तक सीमित नहीं मानी जा सकती।
यदि निगरानी व्यवस्था मजबूत है तो ऐसी स्थिति सामने क्यों आई?
क्या संबंधित अधिकारियों ने विद्यालय का नियमित निरीक्षण किया था?
क्या शिक्षकों की उपस्थिति और मध्यान भोजन की वास्तविक स्थिति की जांच होती है?
इन सवालों के जवाब अब शिक्षा विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों से अपेक्षित हैं। जांच के बाद यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित न रहकर जिम्मेदारी तय करने वाली होनी चाहिए, ताकि ग्रामीण बच्चों की शिक्षा के साथ किसी भी स्तर पर समझौता न हो।




