"औद्योगिक नगरी टंडवा" दुर्दशा टंडवा के लोगों का
पब्लिक की सड़क बनी कोल ट्रांसपोर्टिंग रूट, जाम में रोज फंस रहे बच्चे, मरीज और राहगीर

औद्योगिक नगरी टंडवा की दुर्दशा: नेता-विहीन हुआ इलाका, कोयला ढुलाई ने सड़कों और लोगों की जिंदगी को बनाया बेहाल!
पब्लिक की सड़क बनी कोल ट्रांसपोर्टिंग रूट, जाम में रोज फंस रहे बच्चे, मरीज और राहगीर
टंडवा/चतरा: कभी विकास और औद्योगिक गतिविधियों के लिए चर्चित टंडवा आज अपनी बदहाली पर आंसू बहाने को मजबूर है। क्षेत्र में कोयला परियोजनाओं और लगातार बढ़ती कोल ट्रांसपोर्टिंग के बीच आम लोगों की जिंदगी जाम, धूल और टूटी सड़कों के बीच सिमटती जा रही है।
टंडवा से जिला मुख्यालय चतरा तथा टंडवा से केरेडारी-बड़कागांव और हजारीबाग जाने वाली एसएच-7 सड़क पर कोल हाइवा वाहनों का ऐसा दबाव है कि आम राहगीरों का चलना मुश्किल हो गया है। 31 अगस्त की सुबह से शाम करीब 4 बजे तक सड़क पर भारी जाम की स्थिति बनी रही। कोयला लदे वाहनों की लंबी कतारों में बच्चे, बुजुर्ग, मरीज और आम राहगीर घंटों परेशान रहे।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि जनता के आवागमन के लिए बनी सड़कें अब कोल ट्रांसपोर्टिंग कंपनियों के लिए समर्पित मार्ग बनती जा रही हैं। आए दिन लगने वाले जाम ने स्कूली बच्चों, मरीजों और दैनिक यात्रियों की परेशानी बढ़ा दी है।
कोयला ढुलाई से सड़क बदहाल, गड्ढों में तब्दील हुआ मार्ग
चंद्रगुप्त कोल परियोजना के कोयला ढुलाई मार्ग में बुकरू मोड़ के आसपास चुंदरू मार्ग की हालत बेहद खराब हो चुकी है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि भारी वाहनों की लगातार आवाजाही के कारण सड़क गड्ढों में तब्दील हो गई है।
लोगों का कहना है कि विभिन्न कोल ट्रांसपोर्टिंग कंपनियों और भारी वाहनों की लगातार आवाजाही ने टंडवा क्षेत्र की सड़कों पर भारी दबाव डाल दिया है। ओसेल, पीएनएम सहित अन्य कोल ट्रांसपोर्टिंग गतिविधियों के कारण क्षेत्र में जाम, धूल और सड़क की बदहाली आम समस्या बन गई है।
“कोयला निकल रहा है, लेकिन टंडवा के हिस्से में बदहाली क्यों?”
स्थानीय लोगों में इस बात को लेकर गहरा आक्रोश है कि जिस टंडवा क्षेत्र से बड़े पैमाने पर कोयला और संसाधन निकल रहे हैं, उसी क्षेत्र की जनता आज बुनियादी सुविधाओं के लिए परेशान है।
लोग सवाल उठा रहे हैं—
क्या औद्योगिक विकास की कीमत आम जनता जाम, धूल और टूटी सड़कों से चुकाएगी?
क्या कोयला ढुलाई के लिए अलग और व्यवस्थित मार्ग की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए?
और आखिर टंडवा की इस बदहाली की आवाज जनप्रतिनिधि और जिम्मेदार अधिकारी कब सुनेंगे?
स्थानीय लोगों का कहना है कि टंडवा आज नेता-विहीन और उपेक्षित क्षेत्र की तरह अपनी बदहाली पर “खून के आंसू” बहा रहा है। विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच सड़क, जाम और प्रदूषण की समस्या ने औद्योगिक नगरी की तस्वीर को धुंधला कर दिया है।
अब टंडवा की जनता का सवाल साफ है—
“कोयले से देश और कंपनियां समृद्ध होंगी, लेकिन टंडवा की जनता को जाम, धूल और टूटी सड़कें ही मिलेंगी?”




