‘काम निकलने के बाद कंपनी पहचानती तक नहीं’
दाले उरांव और रामचंद्र उरांव के नेतृत्व में सैकड़ों ग्रामीणों का प्रदर्शन, कंपनी और प्रशासनिक अधिकारियों की अनुपस्थिति पर उठे सवाल

चकला में जमीन अधिग्रहण पर ग्रामीणों का बड़ा विरोध, ग्रामसभा रद्द; बोले—‘जान दे देंगे, जमीन नहीं देंगे’
दाले उरांव और रामचंद्र उरांव के नेतृत्व में सैकड़ों ग्रामीणों का प्रदर्शन, कंपनी और प्रशासनिक अधिकारियों की अनुपस्थिति पर उठे सवाल
लातेहार/चंदवा: चितरपुर (रिवाइज्ड) कोल माइंस के लिए प्रस्तावित जमीन अधिग्रहण को लेकर सोमवार को चकला पंचायत में ग्रामीणों का जोरदार विरोध देखने को मिला। चितरपुर और बरवा टोली समेत आसपास के गांवों से सैकड़ों ग्रामीण प्रस्तावित सहमति प्रक्रिया में शामिल होने पहुंचे थे, लेकिन कंपनी और जिला प्रशासन के संबंधित अधिकारियों के मौके पर नहीं पहुंचने से ग्रामीणों का आक्रोश भड़क उठा।
ग्रामीणों का नेतृत्व चितरपुर के दाले उरांव और बरवा टोली के रामचंद्र उरांव कर रहे थे। ग्रामीणों ने चकला पंचायत की मुखिया से सवाल किया कि जब जमीन अधिग्रहण को लेकर ग्रामीणों की सहमति की प्रक्रिया तय थी, तो कंपनी और जिला प्रशासन के अधिकारी आखिर मौके पर क्यों नहीं पहुंचे।
ग्रामीणों के अनुसार, अधिकारियों की अनुपस्थिति और उत्पन्न स्थिति को देखते हुए मुखिया ने अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए सभा की कार्यवाही रद्द कर दी।
‘जमीन हमारी जिंदगी है, किसी कंपनी को नहीं देंगे’
सभा स्थल पर पहुंचे ग्रामीणों ने दो टूक शब्दों में कहा कि वे किसी भी कंपनी के लिए अपनी जमीन नहीं देंगे, चाहे इसके लिए उन्हें कितना भी बड़ा संघर्ष क्यों न करना पड़े।
ग्रामीणों ने कहा कि उनके लिए जमीन सिर्फ एक संपत्ति नहीं है, बल्कि उनकी आजीविका, पहचान, जंगल और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य है। ऐसे में उनकी सहमति और अधिकारों को नजरअंदाज कर जमीन अधिग्रहण का कोई भी प्रयास स्वीकार नहीं किया जाएगा।
प्रदर्शन के दौरान ग्रामीणों ने कथित तौर पर क्षेत्र में कंपनियों द्वारा किए जा रहे अवैध कार्यों का भी विरोध किया और कहा कि वे अपने जल, जंगल और जमीन के अधिकारों की लड़ाई आगे भी मजबूती से लड़ेंगे।
रामचंद्र उरांव का आरोप—‘काम निकलने के बाद कंपनी पहचानती तक नहीं’
ग्रामीण नेता रामचंद्र उरांव ने कंपनी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि कंपनियां ग्रामीणों को अपने हितों के लिए इस्तेमाल करती हैं और काम निकलने के बाद उन्हें नजरअंदाज कर देती हैं। उन्होंने कहा,
“कंपनी सिर्फ लोगों को बेवकूफ बनाने का काम करती है। काम निकल जाने के बाद लोगों को पहचानती तक नहीं है। मुझे कंपनी में नौकरी मिली है, लेकिन आज कोई पहचान नहीं है। अगर भविष्य में कोई विकट परिस्थिति आती है तो कंपनी हमें पहचानने से भी इंकार कर सकती है।”
हिंडालको पर बिना ग्रामसभा खनन का आरोप
ग्रामीणों ने क्षेत्र में खनन गतिविधियों को लेकर भी सवाल उठाए और आरोप लगाया कि हिंडालको द्वारा बिना ग्रामसभा की प्रक्रिया पूरी किए खनन कार्य किया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि किसी भी परियोजना या जमीन अधिग्रहण से पहले स्थानीय लोगों की सहमति और ग्रामसभा के अधिकारों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
हालांकि, हिंडालको की ओर से यह स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई है कि संबंधित ग्रामसभा हुई है या नहीं।
अधिकारियों की गैरमौजूदगी से बढ़ा आक्रोश
सोमवार को प्रस्तावित सहमति प्रक्रिया के दौरान कंपनी और जिला प्रशासन के अधिकारियों की अनुपस्थिति ने ग्रामीणों की नाराजगी को और बढ़ा दिया। ग्रामीणों का कहना है कि जब उनकी जमीन और भविष्य से जुड़ा इतना महत्वपूर्ण मामला है, तो संबंधित अधिकारियों का मौके पर नहीं पहुंचना गंभीर सवाल खड़े करता है।
ग्रामीणों ने साफ संकेत दिया है कि यदि उनकी सहमति और अधिकारों की अनदेखी की गई तो आने वाले दिनों में आंदोलन और तेज किया जाएगा।
ग्रामीणों का साफ संदेश—
“जल-जंगल-जमीन हमारी पहचान है, इसे किसी कीमत पर नहीं छोड़ेंगे।”




