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झारखण्ड मे कानून की धज्जियां उड़ाते हुए,आनन फानन मे छुट्टी के दिन सोशियोलॉजी हेड को मिला ILS का प्रभार !

झारखण्ड मे कानून की धज्जियां उड़ाते हुए,आनन फानन मे छुट्टी के दिन सोशियोलॉजी हेड को मिला ILS का प्रभार !

क्यों आपस में भिड़े विश्वविद्यालय के पदाधिकारी गण ? क्या है पुरा मामला 

 

रांची विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ लीगल स्टडीज के विद्यार्थियों द्वारा विश्वविद्यालय के खिलाफ हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर किया गया था जिसमें माननीय जस्टिस श्री राजेश कुमार ने सभी विपक्षीगण को अपना काउंटर फाइल करने हेतु 4 सप्ताह का पर्याप्त समय भी दिया था। किंतु ऐसा प्रतीत होता है, इस समय में विश्वविद्यालय के पदाधिकारी गण स्वयं में ही एक दूसरे से भिड़ गए हैं। इंस्टिट्यूट ऑफ़ लीगल स्टडीज के तत्कालीन डायरेक्टर श्री मयंक मिश्रा ने जब अपना पक्ष हाई कोर्ट में फाइल करने के लिए विश्वविद्यालय से वकील की मांग की तो उन्हें रजिस्ट्रार द्वारा लिखित रूप से बहुत सख्ती से मना किया गया कि वो इस केस से दूर रहे तथा किसी भी प्रकार का कोई कार्य ना करें। परन्तु लॉ की जानकारी रखने वाले डायरेक्टर श्री मयंक मिश्रा ने जब विद्यार्थियों के केस में अपना पक्ष फाइल कर दिया तो लगातार उन पर पद छोड़ने का दबाव बनाया जाने लगा, डायरेक्टर द्वारा दो – दो बार भेजी गई इनके कॉन्ट्रैक्ट के एक्सटेंशन को भी विश्वविद्यालय ने खारिज कर दिया। तथा कानून की धज्जियां उड़ाते हुए होली की छुट्टी होने के बावजूद भी अफरातफरी में सोशियोलॉजी के वर्तमान हेड को ILS का प्रभार सौंप दिया जो कानूनी रूप से संपूर्णतः अवैद्य तथा गलत है। BCI के लीगल एजुकेशन रूल के शेड्यूल 3 के रूल 16 के अनुसार कोई कानून पढ़ा हुआ LLB LLM PHD कर के प्रोफेसर रैंक का व्यक्ति को ही किसी भी लॉ कॉलेज अथवा यूनिवर्सिटी डिपार्टमेंट का प्रिंसिपल या डीन बनाया जा सकता है।

 

प्रश्न उठता है कि आखिर क्या कारण है, आखिर क्या छुपाया रहा है विश्वविद्यालय, जिसके वजह से विश्वविद्यालय ने डायरेक्टर को HC में उनका पक्ष डालने से रोका तथा दबाव बनाया? ऐसा क्या जानते थे डायरेक्टर मयंक मिश्रा जिसके वजह से उनको एक्सटेंशन नहीं मिला तथा अफरा तफरी ने गलत ढंग से कानून की धज्जियां उड़ाते हुए होली की छुट्टी के दिन sociology के हेड को पद भार सौंपा गया? विदित हो केस की अगली तारीख 12 मार्च है किंतु अभी तक विश्वविद्यालय के द्वारा उनका पक्ष नहीं फाइल किया गया है। क्या केस होने पर भी विश्वविद्यालय का रवैया विद्यार्थियों के हित में नहीं होगा? क्या विश्वविद्यालय के पदाधिकारी गण जान बुझ कर इंस्टीट्यूट आफ लीगल स्टडीज के हजारों विद्यार्थियों के भविष्य से खेलने का कार्य कर रहे?

 

 

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